Warning: Undefined array key 1 in /var/www/3ba56740-d0e5-465a-99e5-33425b2f2eb0/vedamrit.in/bookscommon/sloka.php on line 93

Deprecated: nl2br(): Passing null to parameter #1 ($string) of type string is deprecated in /var/www/3ba56740-d0e5-465a-99e5-33425b2f2eb0/vedamrit.in/bookscommon/sloka.php on line 97
श्री चैतन्य चरितामृत  »  लीला 3: अन्त्य लीला  »  अध्याय 14: श्री चैतन्य महाप्रभु का कृष्ण-विरह भाव  »  श्लोक 37
 
 
श्लोक  3.14.37 
‘पाइलुँ वृन्दावन - नाथ, पुनः हाराइलुँ ।
के मोर निलेक कृष्ण? काहाँ मुइ आइनु’? ॥37॥
 
 
अनुवाद
श्री चैतन्य महाप्रभु ने कहा, "मुझे वृन्दावन के स्वामी कृष्ण मिल गए, पर मैं उन्हें फिर से खो बैठा हूँ। मेरे कृष्ण को कौन ले गया? मैं कहाँ आ गया?"
 
Sri Chaitanya Mahaprabhu said, "I found Lord Krishna of Vrindavan, but I have lost him again. Who took my Krishna? Where have I come?"
तात्पर्य
**ये श्रीमती राधारानी की भावनाएं हैं। पहले भगवान चैतन्य ने महसूस किया कि उन्हें वृंदावन ले जाया गया है, जहाँ उन्होंने गोपियों के साथ कृष्ण के रास नृत्य को देखा था।** **फिर उन्हें भगवान जगन्नाथ, उनकी बहन (सुभद्रा) और भगवान बलराम को देखने के लिए कुरुक्षेत्र लाया गया।** **श्री चैतन्य महाप्रभु ने वृंदावन और कृष्ण को खो दिया, जो वृंदावन के स्वामी हैं।** **इस समय, चैतन्य महाप्रभु ने कृष्ण से विरह में दिव्योनमाद, अलौकिक पागलपन का अनुभव किया।** **कुरुक्षेत्र में, कृष्ण अपनी भव्यता का प्रदर्शन करते हैं, जबकि वृंदावन में वे अपने मूल स्थिति में हैं।** **कृष्ण वृंदावन से एक कदम भी दूर नहीं जाते हैं; इसलिए गोपियों के लिए कुरुक्षेत्र वृंदावन से कम महत्वपूर्ण है।**

**हालांकि जो भक्त भव्यता (उनके वैकुंठ पहलू) में कृष्ण की पूजा करते हैं, वे कुरुक्षेत्र में सुभद्रा और बलराम के साथ भगवान कृष्ण को देखना पसंद कर सकते हैं, गोपियाँ कृष्ण को वृंदावन में देखना चाहती हैं, जो श्रीमती राधारानी के साथ रास नृत्य कर रहे हैं।** **श्री चैतन्य महाप्रभु ने व्यावहारिक उदाहरण द्वारा दिखाया कि कैसे कोई कृष्ण से विरह में राधारानी और अन्य गोपियों के भाव को विकसित कर सकता है।** **इस भाव में लीन भक्त कृष्ण को वृंदावन के अतिरिक्त कहीं और नहीं देखना चाहते हैं। इसलिए श्री चैतन्य महाप्रभु ने विलाप किया, "मैंने कृष्ण को वृंदावन में पाया, और अब मैंने उन्हें फिर से खो दिया है और कुरुक्षेत्र आ गया हूं।"** **जब तक कोई बहुत ऊंचा भक्त न हो, वह इन जटिल भावनाओं को समझ नहीं सकता है।** **हालाँकि, श्री चैतन्य-चरितामृत के लेखक ने जहाँ तक संभव हो इस दिव्योनमाद को समझाने की कोशिश की है, और हमारा कर्तव्य है कि हम जहाँ तक संभव हो इसकी सराहना करें।** **इसलिए लेखक ने श्लोक 11 में निम्नलिखित अनुरोध किया है:**

**ताते विश्वास करि' सुन भाँवेर वर्णन**

**हा-इबे भाँवेर ज्ञान, पाँइबा प्रेम-धन**

*"प्रिय पाठकों, बस इस विवरण को श्रद्धा और प्रेम से सुनने का प्रयास करें। इससे आपको अलौकिक आनंद को समझने में मदद मिलेगी, और अंत में आप बहुत आसानी से भगवान के प्रेम को प्राप्त कर लेंगे।"*

 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)