**हालांकि जो भक्त भव्यता (उनके वैकुंठ पहलू) में कृष्ण की पूजा करते हैं, वे कुरुक्षेत्र में सुभद्रा और बलराम के साथ भगवान कृष्ण को देखना पसंद कर सकते हैं, गोपियाँ कृष्ण को वृंदावन में देखना चाहती हैं, जो श्रीमती राधारानी के साथ रास नृत्य कर रहे हैं।** **श्री चैतन्य महाप्रभु ने व्यावहारिक उदाहरण द्वारा दिखाया कि कैसे कोई कृष्ण से विरह में राधारानी और अन्य गोपियों के भाव को विकसित कर सकता है।** **इस भाव में लीन भक्त कृष्ण को वृंदावन के अतिरिक्त कहीं और नहीं देखना चाहते हैं। इसलिए श्री चैतन्य महाप्रभु ने विलाप किया, "मैंने कृष्ण को वृंदावन में पाया, और अब मैंने उन्हें फिर से खो दिया है और कुरुक्षेत्र आ गया हूं।"** **जब तक कोई बहुत ऊंचा भक्त न हो, वह इन जटिल भावनाओं को समझ नहीं सकता है।** **हालाँकि, श्री चैतन्य-चरितामृत के लेखक ने जहाँ तक संभव हो इस दिव्योनमाद को समझाने की कोशिश की है, और हमारा कर्तव्य है कि हम जहाँ तक संभव हो इसकी सराहना करें।** **इसलिए लेखक ने श्लोक 11 में निम्नलिखित अनुरोध किया है:**
**ताते विश्वास करि' सुन भाँवेर वर्णन**
**हा-इबे भाँवेर ज्ञान, पाँइबा प्रेम-धन**
*"प्रिय पाठकों, बस इस विवरण को श्रद्धा और प्रेम से सुनने का प्रयास करें। इससे आपको अलौकिक आनंद को समझने में मदद मिलेगी, और अंत में आप बहुत आसानी से भगवान के प्रेम को प्राप्त कर लेंगे।"*
