श्री चैतन्य चरितामृत  »  लीला 3: अन्त्य लीला  »  अध्याय 14: श्री चैतन्य महाप्रभु का कृष्ण-विरह भाव  »  श्लोक 31
 
 
श्लोक  3.14.31 
पूर्वे आसि’ यबे कैला जगन्नाथ दरशन ।
जगन्नाथे देखे - साक्षात् व्रजेन्द्र - नन्दन ॥31॥
 
 
अनुवाद
कुछ समय पहले ही श्री चैतन्य महाप्रभु ने महाराज नंद के पुत्र कृष्ण के रूप में भगवान जगन्नाथ के साक्षात दर्शन किये थे।
 
Before this, Sri Chaitanya Mahaprabhu had been seeing Lord Jagannath in the form of Krishna, the son of Maharaja Nanda.
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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