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श्री चैतन्य चरितामृत  »  लीला 3: अन्त्य लीला  »  अध्याय 14: श्री चैतन्य महाप्रभु का कृष्ण-विरह भाव  »  श्लोक 28
 
 
श्लोक  3.14.28 
तार आर्ति दे खि’ प्रभु कहिते लागिला ।
“एत आर्ति जगन्नाथ मोरे नाहि दिला! ॥28॥
 
 
अनुवाद
स्त्री की उत्सुकता देखकर श्री चैतन्य महाप्रभु ने कहा, "भगवान जगन्नाथ ने मुझ पर इतनी उत्सुकता नहीं दिखाई है।
 
Seeing the curiosity of that woman, Sri Chaitanya Mahaprabhu said that Jagannath ji did not give me so much curiosity.
तात्पर्य
वह स्त्री भगवान जगन्नाथ को देखने के लिए इतनी उत्सुक थी कि वह भूल गई कि वह गरूड़ के स्तंभ पर चढ़कर वैष्णव के चरणों का अनादर कर रही है। वह यह भी भूल गई कि श्री चैतन्य महाप्रभु के कंधे पर पैर रखकर, वह भगवान के परम व्यक्तित्व का अपमान कर रही है। ये दोनों ही भारी अपराध हैं जो परम भगवान और वैष्णवों को अप्रसन्न करते हैं। हालाँकि, वह भगवान जगन्नाथ को देखने के लिए इतनी उत्सुक थी कि उसने अनजाने में ये सभी अपराध किए। श्री चैतन्य महाप्रभु ने उसकी उत्सुकता की प्रशंसा की; उन्होंने अफसोस जताया कि भगवान जगन्नाथ ने उन पर इतनी बड़ी उत्सुकता नहीं बरती थी।
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)