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श्लोक 3.14.28  |
तार आर्ति दे खि’ प्रभु कहिते लागिला ।
“एत आर्ति जगन्नाथ मोरे नाहि दिला! ॥28॥ |
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| अनुवाद |
| स्त्री की उत्सुकता देखकर श्री चैतन्य महाप्रभु ने कहा, "भगवान जगन्नाथ ने मुझ पर इतनी उत्सुकता नहीं दिखाई है। |
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| Seeing the curiosity of that woman, Sri Chaitanya Mahaprabhu said that Jagannath ji did not give me so much curiosity. |
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