श्री चैतन्य चरितामृत  »  लीला 3: अन्त्य लीला  »  अध्याय 14: श्री चैतन्य महाप्रभु का कृष्ण-विरह भाव  »  श्लोक 16
 
 
श्लोक  3.14.16 
एतस्य मोहनाख्यस्य
गतिं कामप्युपेयुषः
भ्रमाभा कापि वैचित्री
दिव्योन्माद इतीर्यते
उद्भूर्णा - चित्र - जल्पाद्यास्
तद्भेदा बहवो मताः ॥16॥
 
 
अनुवाद
"जब मोह का आनंदात्मक भाव धीरे-धीरे बढ़ता है, तो वह विस्मय के समान हो जाता है। तब व्यक्ति विस्मय [वैचित्री] की अवस्था तक पहुँचता है, जो दिव्य उन्माद को जागृत करती है। उदघुर्णा और चित्र-जल्प, दिव्य उन्माद के अनेक प्रकारों में से दो हैं।"
 
"As the state of enchantment gradually increases, it becomes like a delusion. Then comes the state of Vaichitri, or wonder, which awakens divine ecstasy. Of the many divisions of divine ecstasy, two are Udbhurna and Chitrajalpa."
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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