श्री चैतन्य चरितामृत  »  लीला 3: अन्त्य लीला  »  अध्याय 14: श्री चैतन्य महाप्रभु का कृष्ण-विरह भाव  »  श्लोक 121
 
 
श्लोक  3.14.121 
एबे प्रभु यत कैला अलौकिक - लीला ।
के वर्णिते पारे सेइ महाप्रभुर खेला? ॥121॥
 
 
अनुवाद
श्री चैतन्य महाप्रभु की समस्त विलक्षण लीलाओं का वर्णन कौन कर सकता है? वे सब उनकी ही लीला हैं।
 
Who can accurately describe all the extraordinary pastimes of Sri Chaitanya Mahaprabhu? These are all merely His games.
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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