श्री चैतन्य चरितामृत  »  लीला 3: अन्त्य लीला  »  अध्याय 14: श्री चैतन्य महाप्रभु का कृष्ण-विरह भाव  »  श्लोक 118
 
 
श्लोक  3.14.118 
एइ त’ कहिलुँ प्रभुर दिव्योन्माद - भाव ।
ब्रह्माओ कहिते नारे याहार प्रभाव ॥118॥
 
 
अनुवाद
इस प्रकार मैंने श्री चैतन्य महाप्रभु के दिव्य आनंदमय भावों का वर्णन किया है। ब्रह्माजी भी उनके प्रभाव का वर्णन नहीं कर सकते।
 
Thus I have described the transcendental ecstasy of Sri Chaitanya Mahaprabhu. Even Lord Brahma cannot describe their effect.
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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