श्री चैतन्य चरितामृत  »  लीला 3: अन्त्य लीला  »  अध्याय 14: श्री चैतन्य महाप्रभु का कृष्ण-विरह भाव  »  श्लोक 105
 
 
श्लोक  3.14.105 
“गोवर्धन हैते मोरे के इहाँ आनिल ? ।
पाञा कृष्णेर लीला देखिते ना पाइल” ॥105॥
 
 
अनुवाद
श्री चैतन्य महाप्रभु ने कहा, "मुझे गोवर्धन पर्वत से यहाँ कौन लाया है? मैं भगवान कृष्ण की लीलाएँ देख रहा था, लेकिन अब मैं उन्हें नहीं देख सकता।"
 
Sri Chaitanya Mahaprabhu said, "Who brought me here from Govardhana Hill? I was watching the pastimes of Krishna, but now I cannot see them.
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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