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अध्याय 14: श्री चैतन्य महाप्रभु का कृष्ण-विरह भाव
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श्लोक 103
श्लोक
3.14.103
उठि’ महाप्रभु विस्मित, इति उति चाय ।
ये देखते चाय, ताहा देखिते ना पाय ॥103॥
अनुवाद
श्री चैतन्य महाप्रभु आश्चर्यचकित होकर खड़े हो गए और इधर-उधर देखने लगे, कुछ देखने का प्रयास करने लगे। परन्तु उन्हें कुछ दिखाई नहीं दिया।
Sri Chaitanya Mahaprabhu stood up in astonishment and looked around for something to see. But he could not see it.
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हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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