| श्री चैतन्य चरितामृत » लीला 3: अन्त्य लीला » अध्याय 14: श्री चैतन्य महाप्रभु का कृष्ण-विरह भाव » श्लोक 102 |
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| | | | श्लोक 3.14.102  | सानन्दे सकल वैष्णव बले ‘हरि’ ‘हरि’ ।
उठिल मङ्गल - ध्वनि चतुर्दिक्भरि’ ॥102॥ | | | | | | | अनुवाद | | जब श्री चैतन्य महाप्रभु खड़े हुए, तो सभी वैष्णवों ने हर्षोल्लास से उच्च स्वर में "हरि! हरि!" का जाप किया। इस शुभ ध्वनि से चारों ओर का वातावरण गूंज उठा। | | | | When Sri Chaitanya Mahaprabhu stood up, all the Vaishnavas, filled with joy, loudly chanted, "Hari! Hari!" This auspicious sound filled all directions. | | ✨ ai-generated | | |
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