श्री चैतन्य चरितामृत  »  लीला 3: अन्त्य लीला  »  अध्याय 13: जगदानन्द पण्डित तथा रघुनाथ भट्ट गोस्वामी के साथ लीलाएँ  »  श्लोक 76
 
 
श्लोक  3.13.76 
मुखे तार झाल गेल, जिह्वा करे ज्वाला ।
वृन्दावनेर ‘पीलु’ खाइते एइ एक लीला ॥76॥
 
 
अनुवाद
मिर्च के तीखे स्वाद से बीज चबाने वालों की जीभ जल जाती थी। इस प्रकार वृंदावन से लाए गए पीलू फल खाना श्री चैतन्य महाप्रभु का एक मनोरंजन बन गया।
 
Those who chewed the seeds felt their tongues burn with the pungent pepper-like taste. Thus, eating the Pilu fruits brought from Vrindavan became a pastime for Sri Chaitanya Mahaprabhu.
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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