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श्लोक 3.13.61  |
रक्त - वस्त्र ‘वैष्णवेर’ परिते ना युयाय ।
कोन प्रवासीरे दिमु, कि काय उहाय ? ॥61॥ |
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| अनुवाद |
| "यह भगवा वस्त्र वैष्णवों के पहनने के लिए अनुपयुक्त है; इसलिए मुझे इससे कोई प्रयोजन नहीं। मैं इसे किसी अजनबी को दे दूँगा।" |
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| "This saffron robe is unsuitable for a Vaishnava to wear, so it is of no use to me. I will give it to someone unknown." |
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