श्री चैतन्य चरितामृत  »  लीला 3: अन्त्य लीला  »  अध्याय 13: जगदानन्द पण्डित तथा रघुनाथ भट्ट गोस्वामी के साथ लीलाएँ  »  श्लोक 57
 
 
श्लोक  3.13.57 
अन्य सन्यासीर वस्त्र तुमि धर शिरे ।
कोन् ऐछे हय , - इहा पारे सहिबारे ?” ॥57॥
 
 
अनुवाद
"फिर भी, तुमने एक दूसरे संन्यासी द्वारा दिए गए कपड़े से अपना सिर बाँध लिया है। ऐसा व्यवहार कौन सहन कर सकता है?"
 
"Yet you've tied the cloth given to you by another monk on your head. Who can tolerate such behavior?"
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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