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श्री चैतन्य चरितामृत
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लीला 3: अन्त्य लीला
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अध्याय 13: जगदानन्द पण्डित तथा रघुनाथ भट्ट गोस्वामी के साथ लीलाएँ
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श्लोक 29
श्लोक
3.13.29
सहजेइ मोर ताहाँ याइते मन हय ।
प्रभु - आज्ञा लञा देह’, करिये विन य” ॥29॥
अनुवाद
"स्वाभाविक रूप से मेरी वृन्दावन जाने की इच्छा है; अतः कृपया उनसे विनम्रतापूर्वक अनुमति देने का अनुरोध करें।"
“I have a strong desire to go to Vrindavan, so please humbly request him to give me permission.”
समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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