श्री चैतन्य चरितामृत  »  लीला 3: अन्त्य लीला  »  अध्याय 13: जगदानन्द पण्डित तथा रघुनाथ भट्ट गोस्वामी के साथ लीलाएँ  »  श्लोक 135
 
 
श्लोक  3.13.135 
महाप्र भुर कृपाय कृष्ण - प्रेम अनर्गल ।
एइ त’ कहिलुँ ताते चैतन्य - कृपा - फल ॥135॥
 
 
अनुवाद
इस प्रकार मैंने श्री चैतन्य महाप्रभु की उस शक्तिशाली कृपा का वर्णन किया है, जिसके कारण रघुनाथ भट्ट गोस्वामी निरंतर कृष्ण के प्रेम से अभिभूत रहते थे।
 
In this way I have described the grace of Sri Chaitanya Mahaprabhu, due to which Raghunath Bhatta Goswami was always immersed in love for Krishna.
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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