श्री चैतन्य चरितामृत  »  लीला 3: अन्त्य लीला  »  अध्याय 13: जगदानन्द पण्डित तथा रघुनाथ भट्ट गोस्वामी के साथ लीलाएँ  »  श्लोक 133
 
 
श्लोक  3.13.133 
वैष्णवेर निन्द्य - कर्म नाहि पाडे काणे ।
सबे कृष्ण भजन करे, - एइ - मात्र जाने ॥133॥
 
 
अनुवाद
वह न तो किसी वैष्णव की निन्दा सुनता था, न ही किसी वैष्णव के दुर्व्यवहार की चर्चा सुनता था। वह केवल इतना जानता था कि सभी कृष्ण की सेवा में लगे हुए हैं; उसे और कुछ समझ में नहीं आता था।
 
He would neither listen to the slander of a Vaishnava nor hear of any Vaishnava's misconduct. He knew only that everyone was engaged in the service of Krishna. He understood nothing else.
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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