श्री चैतन्य चरितामृत  »  लीला 3: अन्त्य लीला  »  अध्याय 13: जगदानन्द पण्डित तथा रघुनाथ भट्ट गोस्वामी के साथ लीलाएँ  »  श्लोक 120
 
 
श्लोक  3.13.120 
“आमार आज्ञाय, रघुनाथ, याह वृन्दावने ।
ताहाँ याञा रह रूप - सनातन - स्थाने ॥120॥
 
 
अनुवाद
“मेरे प्रिय रघुनाथ, मेरी आज्ञा से वृन्दावन जाओ और वहाँ रूप तथा सनातन गोस्वामी की देख-रेख में रहो।
 
"O Lord of the Raghus, as I command you, go to Vrindavan. There, live under the protection of the Rupa and Sanatana Gosvamis.
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)