श्री चैतन्य चरितामृत  »  लीला 3: अन्त्य लीला  »  अध्याय 13: जगदानन्द पण्डित तथा रघुनाथ भट्ट गोस्वामी के साथ लीलाएँ  »  श्लोक 115
 
 
श्लोक  3.13.115 
आलिङ्गन करि’ प्रभु विदाय ताँरे दिला ।
प्रेमे गर गर भट्ट कान्दिते लागिला ॥115॥
 
 
अनुवाद
तब भगवान ने उन्हें गले लगाया और विदा किया। प्रेमोन्मत्त होकर रघुनाथ भट्ट श्री चैतन्य महाप्रभु से वियोग के कारण रोने लगे।
 
Mahaprabhu then embraced him and bid him farewell. Overwhelmed with love and the impending separation from Sri Chaitanya Mahaprabhu, Raghunatha Bhatta began to weep.
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)