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श्लोक 3.13.101  |
दण्ड - परणाम क रि’ भट्ट पड़िला चरणे ।
प्रभु ‘रघुनाथ’ जानि कैला आलिङ्गने ॥101॥ |
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| अनुवाद |
| रघुनाथ भट्ट श्री चैतन्य महाप्रभु के चरणकमलों पर दंड की भाँति सीधे गिर पड़े। तब भगवान ने उन्हें गले लगा लिया, क्योंकि वे भली-भाँति जानते थे कि वे कौन हैं। |
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| Raghunatha Bhatta fell like a staff at the feet of Sri Chaitanya Mahaprabhu. Then Mahaprabhu, knowing full well who he was, embraced him. |
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