श्री चैतन्य चरितामृत  »  लीला 3: अन्त्य लीला  »  अध्याय 12: श्री चैतन्य महाप्रभु एवं जगदानन्द पण्डित का प्रेम व्यवहार  »  श्लोक 98
 
 
श्लोक  3.12.98 
वासुदेव, मुरारि - गुप्त जगदानन्दे पाञा ।
आनन्दे राखिला घरे, ना देन छाड़िया ॥98॥
 
 
अनुवाद
वासुदेव दत्त और मुरारी गुप्त जगदानंद पंडित को देखकर इतने प्रसन्न हुए कि उन्होंने उन्हें अपने घर पर ही रखा और बाहर जाने की अनुमति नहीं दी।
 
Vasudev Dutt and Murari Gupta were so happy to meet Jagannath Pandit that they kept him in their homes and did not let him go.
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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