श्री चैतन्य चरितामृत  »  लीला 3: अन्त्य लीला  »  अध्याय 12: श्री चैतन्य महाप्रभु एवं जगदानन्द पण्डित का प्रेम व्यवहार  »  श्लोक 94
 
 
श्लोक  3.12.94 
निमाञि खाञाछे, - ऐछे हय मोर मन ।
पाछे ज्ञान हय , - मुञि देखिनु ‘स्वपन’” ॥94॥
 
 
अनुवाद
“कभी-कभी मुझे लगता है कि निमाई ने उन्हें खा लिया है, लेकिन बाद में मुझे लगता है कि मैं केवल सपना देख रहा था।”
 
“Sometimes I think Nimai has eaten them, but later I think I was only dreaming.”
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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