श्री चैतन्य चरितामृत  »  लीला 3: अन्त्य लीला  »  अध्याय 12: श्री चैतन्य महाप्रभु एवं जगदानन्द पण्डित का प्रेम व्यवहार  »  श्लोक 92
 
 
श्लोक  3.12.92 
आमि याइ’ भोजन करि - माता नाहि जाने ।
साक्षाते खाइ आमि’ तेंहो ‘स्वप्न’ हेन माने” ॥92॥
 
 
अनुवाद
"मैं वहाँ जाता हूँ और अपनी माँ का दिया हुआ खाना खाता हूँ, लेकिन वह समझ नहीं पाती कि मैं उसे सीधे खा रहा हूँ। वह सोचती है कि यह कोई सपना है।"
 
"I go there and eat the food my mother gives me, but she doesn't understand that I'm actually eating. She thinks it's a dream."
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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