श्री चैतन्य चरितामृत  »  लीला 3: अन्त्य लीला  »  अध्याय 12: श्री चैतन्य महाप्रभु एवं जगदानन्द पण्डित का प्रेम व्यवहार  »  श्लोक 84
 
 
श्लोक  3.12.84 
यारे यैछे नाचाय प्रभु स्वतन्त्र ईश्वर ।
ताते ताँरे छाड़ि’ लोक याय देशान्तर ॥84॥
 
 
अनुवाद
श्री चैतन्य महाप्रभु पूर्णतः स्वतंत्र भगवान हैं और अपनी इच्छानुसार सबको नचाते हैं। अतः उनका साथ छोड़कर सभी भक्त देश के विभिन्न भागों में स्थित अपने-अपने घरों को लौट गए।
 
Sri Chaitanya Mahaprabhu is a completely independent Supreme Being. He makes everyone dance to His will. Therefore, all the devotees left Him and returned to their homes in different parts of the country.
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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