श्री चैतन्य चरितामृत  »  लीला 3: अन्त्य लीला  »  अध्याय 12: श्री चैतन्य महाप्रभु एवं जगदानन्द पण्डित का प्रेम व्यवहार  »  श्लोक 73
 
 
श्लोक  3.12.73 
सन्यासी मानुष मोर, नाहि कोन धन ।
कि दिया तोमार ऋण करिमु शोधन? ॥73॥
 
 
अनुवाद
मैं एक भिखारी हूँ और मेरे पास पैसे नहीं हैं। आपने मुझ पर जो उपकार किया है, उसका ऋण मैं कैसे चुकाऊँ?
 
"I am a sannyasi and I have no money. How can I repay the kindness you have shown me?"
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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