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श्लोक 3.12.70  |
आइलेन आचार्य - गोसाञि मोरे कृपा करि’ ।
प्रेम - ऋणे बद्ध आमि, शुधिते ना पारि ॥70॥ |
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| अनुवाद |
| "मुझ पर अपनी अहैतुकी कृपा से अद्वैत आचार्य भी यहाँ पधारे हैं। उनके स्नेहपूर्ण व्यवहार के लिए मैं उनका ऋणी हूँ। इस ऋण को चुकाना मेरे लिए असंभव है।" |
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| "Advaita Acharya has also come here out of his causeless kindness to me. I am indebted to him for his kindness. It is impossible for me to repay this debt." |
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