श्री चैतन्य चरितामृत  »  लीला 3: अन्त्य लीला  »  अध्याय 12: श्री चैतन्य महाप्रभु एवं जगदानन्द पण्डित का प्रेम व्यवहार  »  श्लोक 70
 
 
श्लोक  3.12.70 
आइलेन आचार्य - गोसाञि मोरे कृपा करि’ ।
प्रेम - ऋणे बद्ध आमि, शुधिते ना पारि ॥70॥
 
 
अनुवाद
"मुझ पर अपनी अहैतुकी कृपा से अद्वैत आचार्य भी यहाँ पधारे हैं। उनके स्नेहपूर्ण व्यवहार के लिए मैं उनका ऋणी हूँ। इस ऋण को चुकाना मेरे लिए असंभव है।"
 
"Advaita Acharya has also come here out of his causeless kindness to me. I am indebted to him for his kindness. It is impossible for me to repay this debt."
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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