श्री चैतन्य चरितामृत  »  लीला 3: अन्त्य लीला  »  अध्याय 12: श्री चैतन्य महाप्रभु एवं जगदानन्द पण्डित का प्रेम व्यवहार  »  श्लोक 5
 
 
श्लोक  3.12.5 
‘हाहा कृष्ण प्राण - नाथ व्रजेन्द्र - नन्दन! ।
काहाँ याङ काहाँ पाङ, मुरली - वदन!’ ॥5॥
 
 
अनुवाद
भगवान पुकारते, "हे मेरे प्रभु कृष्ण, मेरे जीवन और आत्मा! हे महाराज नंद के पुत्र, मैं कहाँ जाऊँ? मैं आपको कहाँ प्राप्त करूँ? हे परम पुरुषोत्तम, जो अपने मुख से अपनी बांसुरी बजाते हैं!"
 
Mahaprabhu kept crying, “O my Lord Krishna, O my life-giver! O son of Maharaja Nanda, where should I go? Where can I find you? O Lord who plays the flute on his mouth!”
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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