श्री चैतन्य चरितामृत  »  लीला 3: अन्त्य लीला  »  अध्याय 12: श्री चैतन्य महाप्रभु एवं जगदानन्द पण्डित का प्रेम व्यवहार  »  श्लोक 40
 
 
श्लोक  3.12.40 
‘दुःख पाञा आसियाछे’ - एइ प्रभुर वाक्य शुनि’।
जानिला ‘सर्वज्ञ प्रभु’ - एत अनुमानि’ ॥40॥
 
 
अनुवाद
जब श्रीकांत सेन ने भगवान को यह कहते सुना कि, "वे दुःखी हैं," तो वे समझ गए कि भगवान सर्वज्ञ हैं।
 
When Srikanta Sen heard Mahaprabhu say, “He is sad”, he understood that Mahaprabhu is omniscient.
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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