श्री चैतन्य चरितामृत  »  लीला 3: अन्त्य लीला  »  अध्याय 12: श्री चैतन्य महाप्रभु एवं जगदानन्द पण्डित का प्रेम व्यवहार  »  श्लोक 35
 
 
श्लोक  3.12.35 
चैतन्येर पारिषद मोर मातुलेर ख्याति ।
‘ठाकुराली’ करेन गोसाञि, ताँरे मारे लाथि” ॥35॥
 
 
अनुवाद
"मेरे चाचा श्री चैतन्य महाप्रभु के सहयोगियों में से एक के रूप में सुप्रसिद्ध हैं, लेकिन भगवान नित्यानंद प्रभु उन्हें लात मारकर अपनी श्रेष्ठता का दावा करते हैं।"
 
“My maternal uncle is one of the companions of Sri Chaitanya Mahaprabhu, but Nityananda Prabhu wants to show his superiority by kicking him.
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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