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श्री चैतन्य चरितामृत  »  लीला 3: अन्त्य लीला  »  अध्याय 12: श्री चैतन्य महाप्रभु एवं जगदानन्द पण्डित का प्रेम व्यवहार  »  श्लोक 154
 
 
श्लोक  3.12.154 
जगदानन्देर ‘प्रेम - विवर्त’ शुने येइ जन ।
प्रेमेर ‘स्वरूप’ जाने, पाय प्रेम - धन ॥154॥
 
 
अनुवाद
जो कोई भी जगदानंद पंडित और श्री चैतन्य महाप्रभु के बीच प्रेमपूर्ण आदान-प्रदान के बारे में सुनता है, या जगदानंद की पुस्तक "प्रेम-विवर्त" पढ़ता है, वह प्रेम क्या है, यह समझ सकता है। इसके अलावा, उसे कृष्ण का परमानंदमय प्रेम प्राप्त होता है।
 
Anyone who hears about the love relationship between Jagadananda Pandit and Sri Chaitanya Mahaprabhu or reads Jagadananda's book, "Premavivarta," can understand what love is. Furthermore, they experience the ecstasy of Krishna's love.
तात्पर्य
विवर्त शब्द का अर्थ किसी चीज़ को उसके दिखावट के ठीक विपरीत स्वीकार करना होता है। यहाँ जगतानंद पंडित बहुत क्रोधित नज़र आए, लेकिन यह क्रोध श्री चैतन्य महाप्रभु के प्रति उनके महान प्रेम का परिचय था। प्रेम-विवर्त जगतानंद पंडित द्वारा लिखी गई एक पुस्तक का नाम भी है। इसलिए श्री चैतन्य-चरितामृत के लेखक कृष्णदास कविराज गोस्वामी, प्रेम-विवर्त शब्द का प्रयोग उस व्यक्ति के लिए करते हैं जो पुस्तक पढ़ता है या श्री चैतन्य महाप्रभु के साथ जगतानंद पंडित के प्रेमपूर्ण व्यवहार के बारे में सुनता है। ऐसे में व्यक्ति बहुत जल्द कृष्ण के प्रेम को प्राप्त कर लेता है।
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)