श्री चैतन्य चरितामृत  »  लीला 3: अन्त्य लीला  »  अध्याय 12: श्री चैतन्य महाप्रभु एवं जगदानन्द पण्डित का प्रेम व्यवहार  »  श्लोक 116
 
 
श्लोक  3.12.116 
प्रभु कहे, - “पण्डित, तैल आनिला गौड़ ह - इते ।
आमि त’ सन्यासी , - तैल ना पारि ल - इते ॥116॥
 
 
अनुवाद
श्री चैतन्य महाप्रभु ने जगदानंद पंडित से कहा, "मेरे प्रिय पंडित, आप मेरे लिए बंगाल से कुछ तेल लाए हैं, लेकिन चूंकि मैं संन्यासी हूं, इसलिए मैं इसे स्वीकार नहीं कर सकता।
 
Sri Chaitanya Mahaprabhu said to Jagadananda Pandit, “O Pandit, you have brought some oil for me from Bengal, but being a Sanyasi, I cannot accept it.
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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