श्री चैतन्य चरितामृत  »  लीला 3: अन्त्य लीला  »  अध्याय 12: श्री चैतन्य महाप्रभु एवं जगदानन्द पण्डित का प्रेम व्यवहार  »  श्लोक 109
 
 
श्लोक  3.12.109 
जगन्नाथे देह’ तैल, - दीप येन ज्वले ।
तार परिश्रम हैब परम - सफले” ॥109॥
 
 
अनुवाद
"इस तेल को जगन्नाथ मंदिर में पहुँचा दो, जहाँ इसे दीपों में जलाया जा सके। इस तरह, तेल बनाने में जगदानंद का श्रम पूर्णतः सफल होगा।"
 
"Give this oil to the Jagannath Temple, where it can be used in lamps. This way, Jaganananda's efforts to create the oil will be fully successful."
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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