श्री चैतन्य चरितामृत  »  लीला 3: अन्त्य लीला  »  अध्याय 11: हरिदास ठाकुर का महाप्रयाण  »  श्लोक 7
 
 
श्लोक  3.11.7 
जय जयाद्वैत - चन्द्र चैतन्येर आर्य ।
स्व - चरणे भक्ति देह’ जयाद्वैताचार्य ॥7॥
 
 
अनुवाद
अद्वैत आचार्य की जय हो, जिन्हें श्री चैतन्य महाप्रभु अपनी आयु और आदरणीयता के कारण श्रेष्ठ मानते हैं! कृपया मुझे अपने चरणकमलों की भक्ति में संलग्न करें।
 
All glory to that Advaita Acharya, whom Sri Chaitanya Mahaprabhu considers the best because of his age and respect. Please engage me in the devotional service of your lotus feet.
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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