श्री चैतन्य चरितामृत  »  लीला 3: अन्त्य लीला  »  अध्याय 11: हरिदास ठाकुर का महाप्रयाण  »  श्लोक 54
 
 
श्लोक  3.11.54 
स्व - हृदये आ नि’ धरिल प्रभुर चरण ।
सर्व - भक्त - पद - रेणु मस्तक - भूषण ॥54॥
 
 
अनुवाद
उन्होंने श्री चैतन्य महाप्रभु के चरणकमलों को अपने हृदय पर धारण किया और फिर उपस्थित सभी भक्तों की चरणधूलि लेकर अपने मस्तक पर धारण की।
 
He placed the lotus feet of Sri Chaitanya Mahaprabhu on his heart and then took the dust from the feet of all the devotees and applied it on his forehead.
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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