| श्री चैतन्य चरितामृत » लीला 3: अन्त्य लीला » अध्याय 11: हरिदास ठाकुर का महाप्रयाण » श्लोक 5 |
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| | | | श्लोक 3.11.5  | जय गौर - देह कृष्ण स्वयं भगवान् ।
कृपा करि’ देह’ प्रभु, निज - पद - दान ॥5॥ | | | | | | | अनुवाद | | श्री चैतन्य महाप्रभु के दिव्य रूप की जय हो, जो स्वयं भगवान कृष्ण हैं! हे प्रभु, अपनी अहैतुकी कृपा से मुझे अपने चरणकमलों में शरण प्रदान करें। | | | | All glory to the transcendental form of Sri Chaitanya Mahaprabhu, who is the Supreme Personality of Godhead, Krishna Himself! O dear Lord, by Your causeless mercy, please grant me refuge at Your lotus feet. | | ✨ ai-generated | | |
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