श्री चैतन्य चरितामृत  »  लीला 3: अन्त्य लीला  »  अध्याय 11: हरिदास ठाकुर का महाप्रयाण  »  श्लोक 34
 
 
श्लोक  3.11.34 
जिह्वाय उच्चारिमु तोमार ‘कृष्ण - चैतन्य’ - नाम ।
एइ - मत मोर इच्छा , - छाड़िमु पराण ॥34॥
 
 
अनुवाद
"मैं अपनी जीभ से आपके पवित्र नाम, 'श्रीकृष्ण चैतन्य!' का जप करूँ, यही मेरी इच्छा है। कृपया मुझे इस प्रकार अपना शरीर त्यागने की अनुमति दें।"
 
“I wish to pronounce your name ‘Sri Krishna Chaitanya’ with my tongue.
 ✨ ai-generated
 
 
  Connect Form
  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
  © 2026 vedamrit.in All Rights Reserved. Developed by acd