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श्री चैतन्य चरितामृत  »  लीला 3: अन्त्य लीला  »  अध्याय 11: हरिदास ठाकुर का महाप्रयाण  »  श्लोक 30
 
 
श्लोक  3.11.30 
अनेक नाचाइला मोरे प्रसाद करिया ।
विप्रेर श्राद्ध - पात्र खाइ नु ‘म्लेच्छ’ हञा ॥30॥
 
 
अनुवाद
"हे प्रभु, आपकी कृपा से आपने मुझे अनेक प्रकार से नचाया है। उदाहरण के लिए, मुझे श्राद्ध-पत्र दिया गया, जो उच्च कोटि के ब्राह्मणों को दिया जाना चाहिए था। मैंने उसे खाया, हालाँकि मेरा जन्म मांसाहारी परिवार में हुआ था।
 
O Lord, by Your grace You have blessed me in many ways. For example, You gave me the Shraddha vessel, which should have been given to a noble Brahmin. I ate food from it, even though I was born in a family of meat eaters.
तात्पर्य
श्रील भक्तिसिद्धान्त सरस्वती ठाकुर ने अपने अनुभाष्य में श्राद्ध-पात्र के सन्दर्भ में विष्णु-स्मृति से कुछ छंद उद्धृत किए हैं:

ब्राह्मणाः पसदा ह्येते कथिताः पक्ति दूषकाः

एतान विवर्जयेद्यत्नात् श्राद्ध-कर्मणि पंडितः

इस छंद के अनुसार, यदि कोई ब्राह्मण परिवार में जन्मा है, परन्तु ब्राह्मणिक मानकों के अनुसार व्यवहार नहीं करता है, तो उसे श्राद्ध-पात्र अर्पित नहीं किया जाना चाहिए जो पितरों को अर्पित प्रसाद है। अद्वैत आचार्य ने श्राद्ध-पात्र हरिदास ठाकुर को अर्पित किया था, न कि एक ऐसे ब्राह्मण को, जो ब्राह्मण परिवार में जन्मा था। यद्यपि हरिदास ठाकुर मांसाहारी परिवार में जन्मे थे, क्योंकि वे एक उन्नत भक्त थे, उन्हें प्रथम श्रेणी के ब्राह्मण से भी अधिक सम्मान दिया गया था।

 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)