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श्री चैतन्य चरितामृत  »  लीला 3: अन्त्य लीला  »  अध्याय 11: हरिदास ठाकुर का महाप्रयाण  »  श्लोक 24
 
 
श्लोक  3.11.24 
प्रभु कहे,_“वृद्ध ह - इला ‘सङ्ख्या’ अल्प कर ।
सिद्ध - देह तुमि, साधने आग्रह केने क र? ॥24॥
 
 
अनुवाद
"अब चूँकि तुम वृद्ध हो गए हो," भगवान ने कहा, "तुम प्रतिदिन जप की माला कम कर सकते हो। तुम पहले ही मुक्त हो चुके हो, इसलिए तुम्हें नियमों का बहुत सख्ती से पालन करने की आवश्यकता नहीं है।"
 
Mahaprabhu said, "Since you are now old, you can reduce the number of names you chant daily. You are already liberated, so you don't need to follow the rules strictly.
तात्पर्य
जब तक कोई भगवान के स्वमेव प्रेम के स्तर पर नहीं आ जाता है, तब तक उसे नियंत्रित नियमों का पालन करना होगा। ठाकुर हरिदास नियंत्रित नियमों का पालन करने के लिए एक जीवंत उदाहरण थे। इसी तरह, रघुनाथ दास गोस्वामी भी एक ऐसा ही जीवंत उदाहरण थे। षड-गोस्वामी अष्टक में कहा गया है, संखा-पुर्वक-नाम-गान-नतिभिः कालावासानी कृतौ। गोस्वामियों, विशेष रूप से रघुनाथ दास गोस्वामी ने सभी नियंत्रित नियमों का कड़ाई से पालन किया। पहला नियंत्रित नियम यह है कि व्यक्ति को हरि कृष्ण महा-मंत्र का जाप जोर से करना चाहिए ताकि वह खुद को सुन सके, और किसी को निश्चित संख्या में फेरों का जाप करने की प्रतिज्ञा करनी चाहिए। रघुनाथ दास गोस्वामी केवल एक निश्चित संख्या में फेरे का जाप ही नहीं करते थे, बल्कि उन्होंने कई बार झुकने और भगवान को प्रणाम करने की प्रतिज्ञा भी ली थी।
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)