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श्री चैतन्य चरितामृत  »  लीला 3: अन्त्य लीला  »  अध्याय 11: हरिदास ठाकुर का महाप्रयाण  »  श्लोक 20
 
 
श्लोक  3.11.20 
एत बलि’ महा - प्रसाद करिला वन्दन ।
एक रञ्च लञा तार करिला भक्षण ॥20॥
 
 
अनुवाद
यह कहकर उन्होंने महाप्रसाद की प्रार्थना की, थोड़ा सा हिस्सा लिया और उसे खा लिया।
 
Saying this, he saluted the Mahaprasad and took a little of it and consumed it.
तात्पर्य
महाप्रसाद कृष्ण से भिन्न नहीं है। इसलिए, महाप्रसाद खाने के बजाय उसे सम्मान करना चाहिए। यहाँ कहा गया है, करिला वंदना, "उसने प्रार्थना की।" महाप्रसाद लेते समय, भोजन को साधारण तैयारी नहीं मानना चाहिए। प्रसाद का अर्थ है अनुग्रह। महाप्रसाद को कृष्ण का अनुग्रह मानना चाहिए। जैसा कि श्रील भक्तिविनोद ठाकुर ने कहा है, कृष्ण बड़ा दयामय करिबारे जिह्वा जय स्वप्रसाद-अन्न दिला भाई। कृष्ण बहुत दयालु हैं। इस भौतिक दुनिया में हम सभी विभिन्न प्रकार के भोजन का स्वाद लेने में बहुत अधिक आसक्त हैं। इसलिए, कृष्ण कई अच्छी किस्म के भोजन खाते हैं और भक्तों को भोजन वापस अर्पित करते हैं, ताकि न केवल किसी के विभिन्न स्वादों की मांगें पूरी हों, बल्कि प्रसाद खाने से व्यक्ति आध्यात्मिक जीवन में उन्नति करता है। इसलिए, हमें कभी भी साधारण भोजन को महाप्रसाद के समान स्तर पर नहीं मानना ​​चाहिए।
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)