श्री चैतन्य चरितामृत  »  लीला 3: अन्त्य लीला  »  अध्याय 11: हरिदास ठाकुर का महाप्रयाण  »  श्लोक 2
 
 
श्लोक  3.11.2 
जय जय श्री - चैतन्य जय दयामय ।
जयाद्वैत - प्रिय नित्यानन्द - प्रिय जय ॥2॥
 
 
अनुवाद
भगवान श्री चैतन्य महाप्रभु की जय हो, जो अत्यन्त दयालु हैं तथा अद्वैत आचार्य एवं भगवान नित्यानन्द के अत्यंत प्रिय हैं!
 
All hail Sri Chaitanya Mahaprabhu, who is extremely merciful and who is very dear to Advaita Acharya and Nityananda Prabhu.
 ✨ ai-generated
 
 
  Connect Form
  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
  © 2026 vedamrit.in All Rights Reserved. Developed by acd