श्री चैतन्य चरितामृत  »  लीला 3: अन्त्य लीला  »  अध्याय 11: हरिदास ठाकुर का महाप्रयाण  »  श्लोक 106
 
 
श्लोक  3.11.106 
चैतन्य - चरित्र एइ अमृतेर सिन्धु ।
कर्ण - मन तृप्त करे यार एक बिन्दु ॥106॥
 
 
अनुवाद
श्री चैतन्य महाप्रभु का जीवन और चरित्र अमृत के सागर के समान है, जिसकी एक बूंद मन और कान को प्रसन्न कर सकती है।
 
The life and qualities of Sri Chaitanya Mahaprabhu are like an ocean of nectar, a drop of which can satisfy the mind and ears.
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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