श्री चैतन्य चरितामृत  »  लीला 3: अन्त्य लीला  »  अध्याय 10: श्री चैतन्य महाप्रभु अपने भक्तों से प्रसाद ग्रहण करते हैं  »  श्लोक 96
 
 
श्लोक  3.10.96 
‘सेवा’ लागि’ कोटि ‘अपराध’ नाहि गणि ।
स्व - निमित्त ‘अपराधाभा से’ भय मा नि’ ॥96॥
 
 
अनुवाद
"मैं प्रभु की सेवा के लिए सैकड़ों-हजारों अपराध करने से नहीं हिचकिचाऊंगा, लेकिन मैं अपने लिए अपराध की एक झलक पाने से भी बहुत डरता हूं।"
 
“Even if I have to commit millions of crimes to serve the Supreme Lord, I will not mind, but I am extremely afraid of even the slightest trace of a crime for myself.”
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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