श्री चैतन्य चरितामृत  »  लीला 3: अन्त्य लीला  »  अध्याय 10: श्री चैतन्य महाप्रभु अपने भक्तों से प्रसाद ग्रहण करते हैं  »  श्लोक 95
 
 
श्लोक  3.10.95 
गोविन्द कहे मने - ”आमार ‘सेवा’ से ‘नियम’ ।
अपराध ह - उक, किबा नरके गमन” ॥95॥
 
 
अनुवाद
गोविंदा ने मन ही मन उत्तर दिया, "मेरा कर्तव्य सेवा करना है, भले ही मुझे अपराध करना पड़े या नरक जाना पड़े।
 
Govind replied to himself, “My duty is to serve, even if I have to commit a crime or go to hell.
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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