श्री चैतन्य चरितामृत  »  लीला 3: अन्त्य लीला  »  अध्याय 10: श्री चैतन्य महाप्रभु अपने भक्तों से प्रसाद ग्रहण करते हैं  »  श्लोक 87
 
 
श्लोक  3.10.87 
बार बार गोविन्द कहे एक - दिक् ह - इते ।
प्रभु कहे, - ’अङ्ग आमि नारि चालाइते’ ॥87॥
 
 
अनुवाद
गोविंदा ने बार-बार अनुरोध किया, लेकिन भगवान ने उत्तर दिया, "मैं अपना शरीर नहीं हिला सकता।"
 
Govinda requested repeatedly, but Mahaprabhu replied, “I cannot move my body.”
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)