श्री चैतन्य चरितामृत  »  लीला 3: अन्त्य लीला  »  अध्याय 10: श्री चैतन्य महाप्रभु अपने भक्तों से प्रसाद ग्रहण करते हैं  »  श्लोक 39
 
 
श्लोक  3.10.39 
सङ्क्षेपे कहिलुँ एइ झालिर विचार ।
‘राघवेर झालि’ बलि’ विख्याति याहार ॥39॥
 
 
अनुवाद
इस प्रकार मैंने संक्षेप में उन थैलियों का वर्णन किया है जो राघवेरा झाली के नाम से प्रसिद्ध हो गयी हैं।
 
In this way I have briefly described those bags which are famous by the name of 'Raghav ki Jhaali'.
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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