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अध्याय 10: श्री चैतन्य महाप्रभु अपने भक्तों से प्रसाद ग्रहण करते हैं
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श्लोक 115
श्लोक
3.10.115
तुमि से ना खाओ, ताँरा पुछे बार बार ।
कत वञ्चना करिमु, केमने आमार निस्तार ?” ॥115॥
अनुवाद
"तुम तो खाते नहीं, पर वे बार-बार मुझसे पूछते हैं। मैं कब तक उन्हें धोखा देती रहूँगी? मैं इस ज़िम्मेदारी से कैसे मुक्त होऊँगी?"
You don't eat it, but they keep asking me. How long will I keep deceiving them? When will I be able to free myself from this responsibility?"
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हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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