| श्री चैतन्य चरितामृत » लीला 3: अन्त्य लीला » अध्याय 1: महाप्रभु से श्रील रूप गोस्वामी की द्वितीय भेट » श्लोक 86 |
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| | | | श्लोक 3.1.86  | ‘मोर अन्तर - वार्ता रूप जानिल केमने?’ ।
स्वरूप कहे - जानि, कृपा करियाछ आपने ॥86॥ | | | | | | | अनुवाद | | भगवान ने पूछा, "रूप गोस्वामी मेरे हृदय को कैसे समझ पाए?" स्वरूप दामोदर ने उत्तर दिया, "मैं समझ सकता हूँ कि आपने उन पर अपनी अहैतुकी कृपा पहले ही कर दी है।" स्वरूप दामोदर ने उत्तर दिया, "मैं समझ सकता हूँ कि आपने उन पर अपनी अहैतुकी कृपा पहले ही कर दी है। | | | | “How could Rupa Goswami understand my mind?” Mahaprabhu asked. Swarupa Damodara replied, “I understand that You have already bestowed Your causeless mercy upon him.” | | ✨ ai-generated | | |
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