श्री चैतन्य चरितामृत  »  लीला 3: अन्त्य लीला  »  अध्याय 1: महाप्रभु से श्रील रूप गोस्वामी की द्वितीय भेट  »  श्लोक 71
 
 
श्लोक  3.1.71 
दुइ ‘नान्दी’ ‘प्रस्तावना’, दुइ ‘संघटना’ ।
पृथक्करिया लिखि करिया भावना ॥71॥
 
 
अनुवाद
"मैं सौभाग्य के दो अलग-अलग आह्वान और दो अलग-अलग भूमिकाएँ लिखूँगा। मुझे इस विषय पर गहराई से विचार करने दीजिए और फिर दो अलग-अलग घटनाओं का वर्णन करने दीजिए।"
 
"I will write two separate nandis and two separate prefaces. I will think this matter through carefully and describe the events in two separate sections."
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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