श्री चैतन्य चरितामृत  »  लीला 3: अन्त्य लीला  »  अध्याय 1: महाप्रभु से श्रील रूप गोस्वामी की द्वितीय भेट  »  श्लोक 67
 
 
श्लोक  3.1.67 
कृष्णोऽन्यो यदु - सम्भूतो यः पूर्णः सोऽस्त्यतः परः ।
वृन्दावनं परित्यज्य स क्वचित्रैव गच्छति ॥67॥
 
 
अनुवाद
“‘यदुकुमार नाम से विख्यात कृष्ण वासुदेव कृष्ण हैं। वे नंद महाराज के पुत्र कृष्ण से भिन्न हैं। यदुकुमार कृष्ण मथुरा और द्वारका नगरियों में अपनी लीलाएँ करते हैं, किन्तु नंद महाराज के पुत्र कृष्ण कभी भी वृंदावन नहीं छोड़ते।”
 
"Krishna, known as Yadukumara, is Vasudeva Krishna. He is different from the Krishna who is the son of Nanda Maharaja. Yadukumara Krishna performs his pastimes in the cities of Mathura and Dwaraka, but Krishna, the son of Nanda Maharaja, never leaves Vrindavan."
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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