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श्री चैतन्य चरितामृत
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लीला 3: अन्त्य लीला
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अध्याय 1: महाप्रभु से श्रील रूप गोस्वामी की द्वितीय भेट
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श्लोक 66
श्लोक
3.1.66
‘कृष्णेरे बाहिर नाहि करिह व्रज हैते ।
व्रज छा ड़ि’ कृष्ण कभुना यान काहाँते ॥66॥
अनुवाद
“कृष्ण को वृन्दावन से बाहर ले जाने का प्रयास मत करो, क्योंकि वे किसी भी समय कहीं और नहीं जाते।
“Don’t try to take Krishna out of Vrindavan, because He never goes anywhere else.”
समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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