श्री चैतन्य चरितामृत  »  लीला 3: अन्त्य लीला  »  अध्याय 1: महाप्रभु से श्रील रूप गोस्वामी की द्वितीय भेट  »  श्लोक 45
 
 
श्लोक  3.1.45 
भाविते भाविते शीघ्र आइला नीलाचले ।
आसि’ उत्तरिला हरिदास - वासा - स्थले ॥45॥
 
 
अनुवाद
इस प्रकार विचारमग्न होकर वे शीघ्र ही जगन्नाथपुरी पहुँच गए। वहाँ पहुँचकर वे हरिदास ठाकुर की कुटिया के पास पहुँचे।
 
Thus absorbed in thought, he soon reached Jagannath Puri. There, he went to Haridasa Thakura's hut.
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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