श्री चैतन्य चरितामृत  »  लीला 3: अन्त्य लीला  »  अध्याय 1: महाप्रभु से श्रील रूप गोस्वामी की द्वितीय भेट  »  श्लोक 3-4
 
 
श्लोक  3.1.3-4 
श्री - रूप, सनातन भट्ट - रघुनाथ ।
श्री - जीव, गोपाल - भट्ट, दास - रघुनाथ ॥3॥
एइ छय गुरुर करों चरण वन्दन ।
याहा हैते विध्न - नाश, अभीष्ट - पूरण ॥4॥
 
 
अनुवाद
मैं छह गोस्वामी - श्री रूप, सनातन, भट्ट रघुनाथ, श्री जीव, गोपाल भट्ट और दास रघुनाथ - के चरण कमलों की प्रार्थना करता हूँ कि इस साहित्य को लिखने में आने वाली सभी बाधाएँ नष्ट हो जाएँ और मेरी वास्तविक इच्छा पूरी हो।
 
I offer my obeisance to the feet of these six Gosvamis - Shri Rupa, Sanatana, Bhatta Raghunatha, Shri Jiva, Gopala Bhatta and Dasa Raghunatha - so that all obstacles in my path to writing this book may be removed and my true desire may be fulfilled.
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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